आवाहन

Tuesday, April 8, 2014



श्री ज्ञानेश्वर महाराज कृत हरिपाठ



अभंग क्र.१५



एक नाम हरि द्वैत नाम दुरी | अद्वैत कुसरी विरळा जाणे ||१||

 समबुध्दि घेता समान श्रीहरी | शमदमा वेरी हरि झाला ||२||

सर्वाघटीं राम देहा देही एक | सुर्य प्रकाशक सहस्ररश्मीं ||३||

ज्ञानदेवा चित्ती हरिपाठ नेमा | मागिलिया जन्मा मुक्त झालो ||४||

हरि मुखें म्हणां हरि मुखें म्हणां | पुण्याची गणना कोण करी ||धृ||

ek naam nam hari dvait duri advait kusari virala jane

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