श्री ज्ञानेश्वर महाराज कृत हरिपाठ
अभंग क्र.१५
समबुध्दि घेता समान श्रीहरी | शमदमा वेरी हरि झाला ||२||
सर्वाघटीं राम देहा देही एक | सुर्य प्रकाशक सहस्ररश्मीं ||३||
ज्ञानदेवा चित्ती हरिपाठ नेमा | मागिलिया जन्मा मुक्त झालो ||४||
हरि मुखें म्हणां हरि मुखें म्हणां | पुण्याची गणना कोण करी ||धृ||
ek naam nam hari dvait duri advait kusari virala jane
हरि मुखें म्हणां हरि मुखें म्हणां | पुण्याची गणना कोण करी ||धृ||
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