आवाहन

Tuesday, April 8, 2014


श्री ज्ञानेश्वर महाराज कृत हरिपाठ



अभंग क्र.८ 



संतांचे संगती मनोमार्ग गती | आकळावा श्रीपती येणें पंथे ||१|| 

राम कृष्ण वाचा भाव हा जीवाचा | आत्मा जो शिवाचा रामजप ||२||

 एक तत्व नाम साधिती साधन | द्वैताचे बंधन न बाधिजे ||३|| 

नामामृत गोडी वैष्णवा लाधली | योगिया साधली जिवनकळा ||४||

 सत्वर उच्चार प्रल्हादी बिंबला | उध्दवा लाधला कृष्ण दाता ||५|| 

ज्ञानदेव म्हणे नाम हे सुलभ| सर्वत्र दुर्लभ विरळा जाणे ||६||

हरि मुखें म्हणां हरि मुखें म्हणां | पुण्याची गणना कोण करी ||धृ||

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